Saturday, August 6, 2011

Aam Admi

आम आदमी और आम !

आम आदमी अब आम ही रह गया है
हर कोई उसे पकाकर उस का जूस तो
कोई उस का अचार बनाना चाहता है

कोई भी उसकी खूबी को नहीं जानना चाहता
बस उसे एक बार तोडना चाहता है

ये भी नहीं देखता की ये कच्चा है
या पक्का बस उस पर निसाना लगाना चाहता है

पलक चौहान

Tuesday, December 2, 2008

AAj ki Dilli or Insaan

आज की दिल्ली और इंसान 


"बदलते भारत की नई पहचान 
मेरी दिल्ली मेरी जान "

हर तरफ आदमी हो रहा परेशान !
मन्दिर में बैठा खुश हो रहा भगवान !!
छप्पन भोग और हीरे मोती आज मूर्तियोँ  के पास !
दो जून की रोटी को तरस रहा इंसान !!
                   जोर से बोलो मेरी दिल्ली मेरी जान !

बेरोजगारी में महंगाई की मार खा के !
ब्रूश ली जेसे सींक हो गए पहलवान !!
पता नहीं अब इस जीवन की कितनी साँसे बाकी है !
यूंही घुट घुट कर कव निकल जाएँगी जान !!


     मुख से निकलेगा मेरी दिल्ली  हाय राम !!


  
                                                      Palak Chauhan